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Poet's Name
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40 values
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16 values
Poem Text
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66
168k
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
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नागरी ते आगरी भली, नागरी सागरी संग। बूँद परा एह सिंधु में, कौन परिखे रंग॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
साखी सबद ग्रंथ पढ़ि, सीख करिहैं नर नारि। आपन मन बोधा नाहिं, दर्व हरन के झारि॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
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गाय की हत्या कहे, महिषी कहे अशुद्ध। एक हाड़ एक चाम है, एक दहि एक दूध॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
प्रेम मारग बांको बड़ो, समुझि चढ़े कोई जानि। ज्यों खांडो की धारि है, सतगुरु कहा बखानि॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
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दरिया दिल दरपन करो, परसत ऐन अनूप। ऐन ऐना में दीसे, देखि बिमल एक रूप॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
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पढ़ि कुरान फ़ाज़िल हुआ, हाफ़िज़ की ऐसी बात। सांच बिना मैला हुआ, जीव क़ुरबानी खात।
दौलत कवि
null
दोहा
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ससि सौं अति सुंदर न मुष, अंग न सुंदर जान। त प्रीतम रहे बस भयौ, ऐसो प्रेम प्रधान॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
प्रीतम आगम सुनत तिय, हिय मैं अति हुलसात। आनंद के अँसुवा नयन, मुकता सुरत दिवात॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
लाज तजी जिहि काज जग, बैरि कियौ मुख हेरि। तो पिय सौं हित मूढ़ मैं, तोरत करी न बेरि॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
अंग मोतिन के आभरन, सारी पहिरैं स्वेत। चली चाँदनी रैन में, प्रिया प्रानपति हेत॥
दौलत कवि
null
दोहा
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रीझ लैन पिय पैं चली, लिय सषिगन कौं गैल। चहूँ ओर मुखचंद की, रही चाँदनी फैल॥
दौलत कवि
null
दोहा
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तनकौ लाग उसीर तन, घन चंदन कौ नीर। करत सु मार से मार तिहि, मारत तीर समीर॥
दौलत कवि
null
दोहा
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रचत रहैं भूषन बसन, मो मुख लखै सुहाय। ज्यौं-ज्यौं सब कै बस भये, त्यौं-त्यौं रहौं लजाय॥
दौलत कवि
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दोहा
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चली लाज यह काज तजि, मिल्यौ न तहाँ नंदनंद। भई सु आतप चाँदनी, भयौ भानु सो चंद॥
दौलत कवि
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दोहा
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लाज तजी, गुरु लोक डर, तजी जगत की कान। सखी पराये आपने, सनख न पीव निदान॥
दौलत कवि
null
दोहा
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जब ब्याही यह बाल, तब, अलि सब सिखयौ मान। अरु सिखयौ है रूसनौ, अरु सिखयौ पछितान॥
दौलत कवि
null
दोहा
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उमड़ रहे घन सघन अति, रही रैन अँधियार। स्याम रंग सारी दुरी, चली पीउ पैं नार॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
चली बाल पिय पास अति, भरी प्रेम रस-भार। कह्यौ अली कित, लाज बस, लगी सँचारन हार॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
लाज छुटी कुलकान अरु, छुट्यौ सखिनि सुख साज। कहा कहिय सखि बस न कछु, निठुर भये बृजराज॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
प्रीतम कौ तिय सौं मिलन, ह्वै परतच्छ कहाय। नेह भरे नैननि दोऊ, रहे अमित सुख पाय॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
जा दिन तैं चरचा भई, तुमहि चलन की लाल। बिसरि गई बोलनि हसनि, ता दिन तैं वह बाल॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
पिय नैननि मैं बसत सो, बढ़े कहा तुव नैन। मंद हँसी, लाजन मरी, सुनत सखी के बैन॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
मेरे नैन चकोर नित, चहैं सुधा मुखचंद। पै इन चतुर सखीनि मैं, अयैं ना सुखकंद॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
कहा देहुगे जाहु ह्वाँ, रहौ देह तैं दूर। कठिन बचन सहिए न अब, सनष हिये बच कूर॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
पिय दुप्त ओढ़ैं पीत पट, नहिं सषियन दरसाहिं। पिरी परी तन में तऊ, पीर जनावति नाहिं॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
श्रवन सु पी गुन रूप की, सुनत बात सुख होय। जैसौ बरनै रूप सखि, नैननि राखै गोय॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
तिय तन सहज सिंगार हैं, लागी जगमग जोत। आलिनि संग पिय मैं चली, बाढ्यौ प्रेम उदोत॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
उमग रचै भूषन बसन, धरै प्रेम अधिकाय। आजु कहा है? सखि बचन, सुनि तिय रही लजाय॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
अंकित लखि आदर कियौ, कोमल बचन बिकास। पिय सौं मान प्रकास किय, तिय मुख हास उदास॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
नीठ चली आलीनि संग, लष्यौ न तहाँ पिय गेह। काहू सौं बोली न कछु, परी काम बस देह॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
लखत रहैं पिय चित्र कौं, दरसन चित्र निहारि। चित्र लखत पिय कौ सखी, रही चित्र-सी नारि॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
चलन लगे परदेस कौं, दया नहीं, दुख देत। राखत हौं पिय हाथ की, मुँदरी कंकन हेत॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
चाली सकल सिंगार सजि, मिल्यौ न तहाँ सुखकंद। हसत चल्यौ मुखचंद कौं, लग्यौ हसन मुख चंद॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
सखियन संग कौतुक करौ, काहे रहौ उदास। सासु कह्यौ किय सजल दृग, उत्तर भयौ उसास॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
लाज भरी देषत सु मग, रचै सुमन के हार। चतुराई मिस सजत है, भूषन बसन सिंगार॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
करि सिंगार दिन में अली, चली मिलन सुखकंद। सारी जरी पहिरैं करी, पूरी दुपहरी मंद॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
मैं नहिं मान्यौ रोस तैं, पिय बच हित सरसाहिं। रूठि चल्यौ तब, कहा कहुँ, तुमहु मनायौ नाहिं॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
करि राखे भूषन बसन, साँझहिं तैं सु तैयारि। मंदिर के पट खोलि कैं, पौढ़ि रही सुकुमारि॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
सषि, मनु लै मनुहार करि, पाय परयौ जब पीव। कह्यौ न मान्यौ मैं, कियौ, लाज काम बस जीव॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
चलत पियहि तन बाल के, भयो बिरह दरसान। सीत पवन दुख सरस मुख, भई पियरई आन॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
अजौं अली आयौ न पिउ, कहा हेत सु कहै न। अध विकास नैननि रही, आधे कहि मुख बैन॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
नित नबीन भूषन बसन, ल्यावै मेरैं काज। तास करे सरोस द्रग, कहाँ गई मति आज॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
सोवत प्रीतम सुपन सुख, दरसन स्वप्न कहाय। पिय मिलाप सुख अमित सखि, नींदहि दियौ मिलाय॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
पिय लिलार जाबक लसै, अंजन अधर सु पीक। लाज कह्यौ साँहैं भये, साँहैं करौ अलीक॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
क्यौं नहिं आयौ, बारबधु, कहि अंगरात जँभात। राग अलापैं धन मिलै, नैन पुलैं पछितात॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
बैठी सेज सिंगार सजि, हरष जगत तन जोत। सखी दिवस हेमंत कौ, ग्रीषम सम क्यौं होत॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
बारबधू हिय की उमग, चली सु पति के पास। चित उदार, कहँ रसिकमनि, बोली बचन निरास॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
आयौ पीहर तैं सुन्यौ, ही हुलसी अति बाम। बोलि लियौ एकांत तिय, किये काम के काम॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
तुव हित किय, जब सखिन को, लग्यौ न छिन उपदेस। सो अब मो तजि जाहुगे, प्रीतम तुम उपदेस॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
जमुना तीर, समीर तहँ, बहै त्रिबिधि सुख होय। अजौं न आयौ क्यौं न पिय, करैं दोर द्रग दोय॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
पाय परै तरजन करौं, तऊ अधिक हिय हेत। लाज करै नहिं लोक की, मन मान्यौ धन देत॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
चाह धरै प्रीतम मिलन, सजै सिंगार अपार। धरै द्वार दृग दीप द्वै, बारबधू तिहिं बार॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
केलि भवन नंदलाल नहिं, देख्यौ कछु न सुहाय। रही सु बाल सखीनि त्यौं, भौंह चढ़ाय रुषाय॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
घनदानी बानी चतुर, मानी पुरुष बिसेस। हिय बसाय मन साँपियै, सप्ति सो पिय परदेस॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
पीउ न आयौ सो वनहिं, रह्यौ कहूँ रस पागि। कहत न काहू लाज सों, रही सोच मग लागि॥
दौलत कवि
null
दोहा
null
नीठ धरै मग पाय कौं, परी सखिन बस बाल। ज्यौं मराल को बाल धर, सीखत नौतन चाल॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
जो पग धरत सो दृढ़ धरत, पग पाछे नहिं देत। अहंकार कूँ मार करि, राम रूप जस लेत॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
कायर कँपै देख करि, साधू को संग्राम। सीस उतारै भुइँ धरै, जब पावै निज ठाम॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
आप मरन भय दूर करि, मारत रिपु को जाय। महा मोह दल दलन करि, रहै सरूप समाय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
मनमोहन को ध्याइये, तन-मन करि ये प्रीत। हरि तज जे जग में पगे, देखौ बड़ी अनीत॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
'दया' दास हरि नाम लै, या जग में ये सार। हरि भजते हरि ही भये, पायौ भेद अपार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
सूरा सन्मुख समर में, घायल होत निसंक। यों साधू संसार में, जग के सहैं कलंक॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
'दया' सुपन संसार में, ना पचि मरिये बीर। बहुतक दिन बीते बृथा, अब भजिये रघुबीर॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
अर्ध नाम के लेत ही, उधरे पतित अपार। गज गनिका अरु गीध बहु, भये पार संसार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
असु गज अरु कंचन 'दया', जोरे लाख करोर। हाथ झाड़ रीते गये, भयो काल को ज़ोर॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
ब्रह्म रूप सागर सुधा, गहिरो अति गंभीर। आनंद लहर सदा उठै, नहीं धरत मन धीर॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
नित प्रति वंदन कीजिये, गुरु कूँ सीस नवाय। दया सुखी कर देत है, हरि स्वरूप दर साय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
साधू सिंह समान है, गरजत अनुभव ज्ञान। करम भरम सब भजि गये, 'दया' दुर्यो अज्ञान॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
'दया' प्रेम उनमत जे, तन की तनि सुधि नाहिं। झुके रहैं हरि रस छके, थके नेम ब्रत नाहिं॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
कोटि लक्ष व्रत नेम तिथि, साध संग में होय। विषम व्याधि सब मिटत है, शांति रूप सुख जोय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
भाई बंधु कुटुंब सब, भये इकट्ठे आय। दिना पाँच को खेल है, 'दया' काल ग्रासि जाय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
राम टेक से टरत नहिं, आन भाव नहिं होत। ऐसे साधु जनन की, दिन-दिन दूनी जोत॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
जे जन हरि सुमिरन बिमुख, तासूँ मुखहुँ न बोल। राम रूप में जे पगे, तासूँ अंतर खोल॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
श्री गुरदेव दया करी, मैं पायो हरि नाम। एक राम के नाम तें, होत संपूरन काम॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
या जग में कोउ है नहीं, गुरु सम दीन दयाल। मरना गत कू जानि कै, भले करै प्रति पाल॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
चरनदास गुरुदेव ने, मो सूँ कह्यो उचार। 'दया' अहर निसि जपत रहु, सोहं सुमिरन सार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
जैसो मोती ओस को, तैसो यह संसार। बिनसि जाय छिन एक में, 'दया' प्रभू उर धार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
तात मात तुम्हरे गये, तुम भी भये तैयार। आज काल्ह में तुम चलो, 'दया' होहु हुसियार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
राम कहो फिर राम कहु, राम नाम मुख गाव। यह तन बिनस्यो जातु है, नाहिन आन उपाव॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
कहूँ धरत पग परत कहुँ, डिगमिगात सब देह। 'दया' मगन हरि रूप में, दिन-दिन अधिक सनेह॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
दया दान अरु दीनता, दीनानाथ दयाल। हिरदै सीतल दृष्टि सम, निरखत करैं निहाल॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
साध संग जग में बड़ो, जो करि जानै कोय। आधो छिन सतसंग को, कलमष डारे खोय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
बंदौ श्री सुकदेव जी, सब बिधि करो सहाय। हरो सकल जग आपदा, प्रेम-सुधा रस प्याय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
'दया कुँवर' या जक्त में, नहीं रह्यो थिर कोय। जैसो बास सराँय को, तैसो यह जग होय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
सतगुर सम कोउ है नहीं, या जग में दातार। देत दान उपदेस सों, करैं जीव भव पार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
गुरु किरपा बिन होत नहिं, भक्ति भाव बिस्तार। जोग जज्ञ जप-तप 'दया', केवल ब्रह्म बिचार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
जे गुरु कूँ वंदन करै, दया प्रीति के भाव। आनंद मगन सदा रहै, निर विधि ताप नसाव॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
रावन कुंभकरण गये, दुरजोधन बलवंत। मार लिये सब काल ने, ऐसे 'दया' कहंत॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
बिरह ज्वाल उपजी हिये, राम-सनेही आय। मन मोहन सोहन सरस, तुम देखन जा चाय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
प्रेम मगन जे साधवा, बिचरत रहत निसंक। हरि रस के माते 'दया' गिनै राव ना रंक॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
मनसा बाचा करि दया, गुरु चरनों चित लाव। जग समुद्र के तरन कूँ, नाहिन आन उपाय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
प्रेम-पीर अतिही बिकल, कल न परत दिन रैन। सुंदर स्याम सरूप बिन, 'दया' लहत नहिं चैन॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
सोवत जागत हरि भजो, हरि हिरदे न बिसार। डोरो गहि हरि नाम की, 'दया' न टूटै तार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
हँसि गावत रोवत उठत, गिरि-गिरि परत अधीर। पै हरि रस चस को ‘दया’, सहै कठिन तन पीर॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
बिन रसना बिन माल कर, अंतर सुमिरन होय। ‘दया’ दया गुरदेव की, बिरला जानै कोय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
प्रेम-पुंज प्रगटै जहाँ, तहाँ प्रगट हरि होय। ‘दया’ दया करि देत है, श्री हरि दरशन सोय॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
गुरु सबदन कूँ ग्रहण करि, बिषयन कूँ दे पीठ। गोबिंद रूपी गदा गहि, मारो करमन डीठ॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
सूरा वही सराहिये, बिन सिर ल़ड़त कवंद। लोक-लाज कुल-कान कूँ, तोड़ि होत निर्बंद॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
अर्ध-उर्ध मधि सुरति धरि, जपै जु अजपा जाप। 'दया' लहै निज धाम कूँ, छूटै सकल संताप॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
जै जै परमानंद प्रभु, परम पुरुष अभिराम। अंतरजामी कृपानिधि, 'दया' करत परनाम॥