Search is not available for this dataset
Poet's Name stringclasses 61
values | Period stringclasses 40
values | Language stringclasses 3
values | Additional Info stringclasses 16
values | Poem Text stringlengths 66 168k ⌀ |
|---|---|---|---|---|
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | नागरी ते आगरी भली, नागरी सागरी संग।
बूँद परा एह सिंधु में, कौन परिखे रंग॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | साखी सबद ग्रंथ पढ़ि, सीख करिहैं नर नारि।
आपन मन बोधा नाहिं, दर्व हरन के झारि॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | गाय की हत्या कहे, महिषी कहे अशुद्ध।
एक हाड़ एक चाम है, एक दहि एक दूध॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | प्रेम मारग बांको बड़ो, समुझि चढ़े कोई जानि।
ज्यों खांडो की धारि है, सतगुरु कहा बखानि॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | दरिया दिल दरपन करो, परसत ऐन अनूप।
ऐन ऐना में दीसे, देखि बिमल एक रूप॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | पढ़ि कुरान फ़ाज़िल हुआ, हाफ़िज़ की ऐसी बात।
सांच बिना मैला हुआ, जीव क़ुरबानी खात। |
दौलत कवि | null | दोहा | null | ससि सौं अति सुंदर न मुष, अंग न सुंदर जान।
त प्रीतम रहे बस भयौ, ऐसो प्रेम प्रधान॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | प्रीतम आगम सुनत तिय, हिय मैं अति हुलसात।
आनंद के अँसुवा नयन, मुकता सुरत दिवात॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | लाज तजी जिहि काज जग, बैरि कियौ मुख हेरि।
तो पिय सौं हित मूढ़ मैं, तोरत करी न बेरि॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | अंग मोतिन के आभरन, सारी पहिरैं स्वेत।
चली चाँदनी रैन में, प्रिया प्रानपति हेत॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | रीझ लैन पिय पैं चली, लिय सषिगन कौं गैल।
चहूँ ओर मुखचंद की, रही चाँदनी फैल॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | तनकौ लाग उसीर तन, घन चंदन कौ नीर।
करत सु मार से मार तिहि, मारत तीर समीर॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | रचत रहैं भूषन बसन, मो मुख लखै सुहाय।
ज्यौं-ज्यौं सब कै बस भये, त्यौं-त्यौं रहौं लजाय॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | चली लाज यह काज तजि, मिल्यौ न तहाँ नंदनंद।
भई सु आतप चाँदनी, भयौ भानु सो चंद॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | लाज तजी, गुरु लोक डर, तजी जगत की कान।
सखी पराये आपने, सनख न पीव निदान॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | जब ब्याही यह बाल, तब, अलि सब सिखयौ मान।
अरु सिखयौ है रूसनौ, अरु सिखयौ पछितान॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | उमड़ रहे घन सघन अति, रही रैन अँधियार।
स्याम रंग सारी दुरी, चली पीउ पैं नार॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | चली बाल पिय पास अति, भरी प्रेम रस-भार।
कह्यौ अली कित, लाज बस, लगी सँचारन हार॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | लाज छुटी कुलकान अरु, छुट्यौ सखिनि सुख साज।
कहा कहिय सखि बस न कछु, निठुर भये बृजराज॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | प्रीतम कौ तिय सौं मिलन, ह्वै परतच्छ कहाय।
नेह भरे नैननि दोऊ, रहे अमित सुख पाय॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | जा दिन तैं चरचा भई, तुमहि चलन की लाल।
बिसरि गई बोलनि हसनि, ता दिन तैं वह बाल॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | पिय नैननि मैं बसत सो, बढ़े कहा तुव नैन।
मंद हँसी, लाजन मरी, सुनत सखी के बैन॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | मेरे नैन चकोर नित, चहैं सुधा मुखचंद।
पै इन चतुर सखीनि मैं, अयैं ना सुखकंद॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | कहा देहुगे जाहु ह्वाँ, रहौ देह तैं दूर।
कठिन बचन सहिए न अब, सनष हिये बच कूर॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | पिय दुप्त ओढ़ैं पीत पट, नहिं सषियन दरसाहिं।
पिरी परी तन में तऊ, पीर जनावति नाहिं॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | श्रवन सु पी गुन रूप की, सुनत बात सुख होय।
जैसौ बरनै रूप सखि, नैननि राखै गोय॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | तिय तन सहज सिंगार हैं, लागी जगमग जोत।
आलिनि संग पिय मैं चली, बाढ्यौ प्रेम उदोत॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | उमग रचै भूषन बसन, धरै प्रेम अधिकाय।
आजु कहा है? सखि बचन, सुनि तिय रही लजाय॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | अंकित लखि आदर कियौ, कोमल बचन बिकास।
पिय सौं मान प्रकास किय, तिय मुख हास उदास॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | नीठ चली आलीनि संग, लष्यौ न तहाँ पिय गेह।
काहू सौं बोली न कछु, परी काम बस देह॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | लखत रहैं पिय चित्र कौं, दरसन चित्र निहारि।
चित्र लखत पिय कौ सखी, रही चित्र-सी नारि॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | चलन लगे परदेस कौं, दया नहीं, दुख देत।
राखत हौं पिय हाथ की, मुँदरी कंकन हेत॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | चाली सकल सिंगार सजि, मिल्यौ न तहाँ सुखकंद।
हसत चल्यौ मुखचंद कौं, लग्यौ हसन मुख चंद॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | सखियन संग कौतुक करौ, काहे रहौ उदास।
सासु कह्यौ किय सजल दृग, उत्तर भयौ उसास॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | लाज भरी देषत सु मग, रचै सुमन के हार।
चतुराई मिस सजत है, भूषन बसन सिंगार॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | करि सिंगार दिन में अली, चली मिलन सुखकंद।
सारी जरी पहिरैं करी, पूरी दुपहरी मंद॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | मैं नहिं मान्यौ रोस तैं, पिय बच हित सरसाहिं।
रूठि चल्यौ तब, कहा कहुँ, तुमहु मनायौ नाहिं॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | करि राखे भूषन बसन, साँझहिं तैं सु तैयारि।
मंदिर के पट खोलि कैं, पौढ़ि रही सुकुमारि॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | सषि, मनु लै मनुहार करि, पाय परयौ जब पीव।
कह्यौ न मान्यौ मैं, कियौ, लाज काम बस जीव॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | चलत पियहि तन बाल के, भयो बिरह दरसान।
सीत पवन दुख सरस मुख, भई पियरई आन॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | अजौं अली आयौ न पिउ, कहा हेत सु कहै न।
अध विकास नैननि रही, आधे कहि मुख बैन॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | नित नबीन भूषन बसन, ल्यावै मेरैं काज।
तास करे सरोस द्रग, कहाँ गई मति आज॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | सोवत प्रीतम सुपन सुख, दरसन स्वप्न कहाय।
पिय मिलाप सुख अमित सखि, नींदहि दियौ मिलाय॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | पिय लिलार जाबक लसै, अंजन अधर सु पीक।
लाज कह्यौ साँहैं भये, साँहैं करौ अलीक॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | क्यौं नहिं आयौ, बारबधु, कहि अंगरात जँभात।
राग अलापैं धन मिलै, नैन पुलैं पछितात॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | बैठी सेज सिंगार सजि, हरष जगत तन जोत।
सखी दिवस हेमंत कौ, ग्रीषम सम क्यौं होत॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | बारबधू हिय की उमग, चली सु पति के पास।
चित उदार, कहँ रसिकमनि, बोली बचन निरास॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | आयौ पीहर तैं सुन्यौ, ही हुलसी अति बाम।
बोलि लियौ एकांत तिय, किये काम के काम॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | तुव हित किय, जब सखिन को, लग्यौ न छिन उपदेस।
सो अब मो तजि जाहुगे, प्रीतम तुम उपदेस॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | जमुना तीर, समीर तहँ, बहै त्रिबिधि सुख होय।
अजौं न आयौ क्यौं न पिय, करैं दोर द्रग दोय॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | पाय परै तरजन करौं, तऊ अधिक हिय हेत।
लाज करै नहिं लोक की, मन मान्यौ धन देत॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | चाह धरै प्रीतम मिलन, सजै सिंगार अपार।
धरै द्वार दृग दीप द्वै, बारबधू तिहिं बार॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | केलि भवन नंदलाल नहिं, देख्यौ कछु न सुहाय।
रही सु बाल सखीनि त्यौं, भौंह चढ़ाय रुषाय॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | घनदानी बानी चतुर, मानी पुरुष बिसेस।
हिय बसाय मन साँपियै, सप्ति सो पिय परदेस॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | पीउ न आयौ सो वनहिं, रह्यौ कहूँ रस पागि।
कहत न काहू लाज सों, रही सोच मग लागि॥ |
दौलत कवि | null | दोहा | null | नीठ धरै मग पाय कौं, परी सखिन बस बाल।
ज्यौं मराल को बाल धर, सीखत नौतन चाल॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | जो पग धरत सो दृढ़ धरत, पग पाछे नहिं देत।
अहंकार कूँ मार करि, राम रूप जस लेत॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | कायर कँपै देख करि, साधू को संग्राम।
सीस उतारै भुइँ धरै, जब पावै निज ठाम॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | आप मरन भय दूर करि, मारत रिपु को जाय।
महा मोह दल दलन करि, रहै सरूप समाय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | मनमोहन को ध्याइये, तन-मन करि ये प्रीत।
हरि तज जे जग में पगे, देखौ बड़ी अनीत॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | 'दया' दास हरि नाम लै, या जग में ये सार।
हरि भजते हरि ही भये, पायौ भेद अपार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | सूरा सन्मुख समर में, घायल होत निसंक।
यों साधू संसार में, जग के सहैं कलंक॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | 'दया' सुपन संसार में, ना पचि मरिये बीर।
बहुतक दिन बीते बृथा, अब भजिये रघुबीर॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | अर्ध नाम के लेत ही, उधरे पतित अपार।
गज गनिका अरु गीध बहु, भये पार संसार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | असु गज अरु कंचन 'दया', जोरे लाख करोर।
हाथ झाड़ रीते गये, भयो काल को ज़ोर॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | ब्रह्म रूप सागर सुधा, गहिरो अति गंभीर।
आनंद लहर सदा उठै, नहीं धरत मन धीर॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | नित प्रति वंदन कीजिये, गुरु कूँ सीस नवाय।
दया सुखी कर देत है, हरि स्वरूप दर साय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | साधू सिंह समान है, गरजत अनुभव ज्ञान।
करम भरम सब भजि गये, 'दया' दुर्यो अज्ञान॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | 'दया' प्रेम उनमत जे, तन की तनि सुधि नाहिं।
झुके रहैं हरि रस छके, थके नेम ब्रत नाहिं॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | कोटि लक्ष व्रत नेम तिथि, साध संग में होय।
विषम व्याधि सब मिटत है, शांति रूप सुख जोय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | भाई बंधु कुटुंब सब, भये इकट्ठे आय।
दिना पाँच को खेल है, 'दया' काल ग्रासि जाय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | राम टेक से टरत नहिं, आन भाव नहिं होत।
ऐसे साधु जनन की, दिन-दिन दूनी जोत॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | जे जन हरि सुमिरन बिमुख, तासूँ मुखहुँ न बोल।
राम रूप में जे पगे, तासूँ अंतर खोल॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | श्री गुरदेव दया करी, मैं पायो हरि नाम।
एक राम के नाम तें, होत संपूरन काम॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | या जग में कोउ है नहीं, गुरु सम दीन दयाल।
मरना गत कू जानि कै, भले करै प्रति पाल॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | चरनदास गुरुदेव ने, मो सूँ कह्यो उचार।
'दया' अहर निसि जपत रहु, सोहं सुमिरन सार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | जैसो मोती ओस को, तैसो यह संसार।
बिनसि जाय छिन एक में, 'दया' प्रभू उर धार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | तात मात तुम्हरे गये, तुम भी भये तैयार।
आज काल्ह में तुम चलो, 'दया' होहु हुसियार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | राम कहो फिर राम कहु, राम नाम मुख गाव।
यह तन बिनस्यो जातु है, नाहिन आन उपाव॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | कहूँ धरत पग परत कहुँ, डिगमिगात सब देह।
'दया' मगन हरि रूप में, दिन-दिन अधिक सनेह॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | दया दान अरु दीनता, दीनानाथ दयाल।
हिरदै सीतल दृष्टि सम, निरखत करैं निहाल॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | साध संग जग में बड़ो, जो करि जानै कोय।
आधो छिन सतसंग को, कलमष डारे खोय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | बंदौ श्री सुकदेव जी, सब बिधि करो सहाय।
हरो सकल जग आपदा, प्रेम-सुधा रस प्याय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | 'दया कुँवर' या जक्त में, नहीं रह्यो थिर कोय।
जैसो बास सराँय को, तैसो यह जग होय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | सतगुर सम कोउ है नहीं, या जग में दातार।
देत दान उपदेस सों, करैं जीव भव पार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | गुरु किरपा बिन होत नहिं, भक्ति भाव बिस्तार।
जोग जज्ञ जप-तप 'दया', केवल ब्रह्म बिचार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | जे गुरु कूँ वंदन करै, दया प्रीति के भाव।
आनंद मगन सदा रहै, निर विधि ताप नसाव॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | रावन कुंभकरण गये, दुरजोधन बलवंत।
मार लिये सब काल ने, ऐसे 'दया' कहंत॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | बिरह ज्वाल उपजी हिये, राम-सनेही आय।
मन मोहन सोहन सरस, तुम देखन जा चाय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | प्रेम मगन जे साधवा, बिचरत रहत निसंक।
हरि रस के माते 'दया' गिनै राव ना रंक॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | मनसा बाचा करि दया, गुरु चरनों चित लाव।
जग समुद्र के तरन कूँ, नाहिन आन उपाय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | प्रेम-पीर अतिही बिकल, कल न परत दिन रैन।
सुंदर स्याम सरूप बिन, 'दया' लहत नहिं चैन॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | सोवत जागत हरि भजो, हरि हिरदे न बिसार।
डोरो गहि हरि नाम की, 'दया' न टूटै तार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | हँसि गावत रोवत उठत, गिरि-गिरि परत अधीर।
पै हरि रस चस को ‘दया’, सहै कठिन तन पीर॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | बिन रसना बिन माल कर, अंतर सुमिरन होय।
‘दया’ दया गुरदेव की, बिरला जानै कोय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | प्रेम-पुंज प्रगटै जहाँ, तहाँ प्रगट हरि होय।
‘दया’ दया करि देत है, श्री हरि दरशन सोय॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | गुरु सबदन कूँ ग्रहण करि, बिषयन कूँ दे पीठ।
गोबिंद रूपी गदा गहि, मारो करमन डीठ॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | सूरा वही सराहिये, बिन सिर ल़ड़त कवंद।
लोक-लाज कुल-कान कूँ, तोड़ि होत निर्बंद॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | अर्ध-उर्ध मधि सुरति धरि, जपै जु अजपा जाप।
'दया' लहै निज धाम कूँ, छूटै सकल संताप॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | जै जै परमानंद प्रभु, परम पुरुष अभिराम।
अंतरजामी कृपानिधि, 'दया' करत परनाम॥ |
Subsets and Splits
No community queries yet
The top public SQL queries from the community will appear here once available.