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66
168k
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
तुलसी परिहरि हरि हरहि, पाँवर पूजहिं भूत। अंत फजीहत होहिंगे, गनिका के से पूत॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम। मनहुँ पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
राम-नाम-मनि-दीप धरु, जीह देहरी द्वार। ‘तुलसी’ भीतर बाहिरौ, जौ चाहसि उजियार॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
‘तुलसी’ जस भवितव्यता, तैसी मिलै सहाय। आपु न आवै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाय॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह। ‘तुलसी’ तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
रघुपति कीरति कामिनी, क्यों कहै तुलसीदासु। सरद अकास प्रकास ससि, चार चिबुक तिल जासु॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
अमिय गारि गारेउ गरल, नारी करि करतार। प्रेम बैर की जननि युग, जानहिं बुध न गँवार॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
दुर्जन दर्पण सम सदा, करि देखौ हिय गौर। संमुख की गति और है, विमुख भए पर और॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
घर दीन्हे घर जात है, घर छोड़े घर जाय। ‘तुलसी’ घर बन बीच रहू, राम प्रेम-पुर छाय॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
बिनु विश्वास भगति नहीं, तेही बिनु द्रवहिं न राम। राम-कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लहि विश्राम॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
गंगा जमुना सुरसती, सात सिंधु भरपूर। ‘तुलसी’ चातक के मते, बिन स्वाती सब धूर॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
ऊँची जाति पपीहरा, पियत न नीचौ नीर। कै याचै घनश्याम सों, कै दु:ख सहै सरीर॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस। बरसत बारिद बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
राम नाम रति राम गति, राम नाम बिस्वास। सुमिरत सुभ मंगल कुसल, दुहुँ दिसि तुलसीदास॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
‘तुलसी’ संत सुअंब तरु, फूलि फलहिं पर हेत। इतते ये पाहन हनत, उतते वे फल देत॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
असन बसन सुत नारि सुख, पापिहुँ के घर होइ। संत-समागम रामधन, ‘तुलसी’ दुर्लभ दोइ॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
राम भरोसो राम बल, राम नाम बिस्वास। सुमिरत सुभ मंगल कुसल, मांगत तुलसीदास॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
नाम गरीबनिवाज को, राज देत जन जानि। तुलसी मन परिहरत नहिं, धुरविनिआ की वानि॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
मान रखिवौ माँगिबौ, पिय सों सहज सनेहु। ‘तुलसी’ तीनों तब फबैं, जब चातक मत लेहु॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
हरे चरहिं तापहिं बरे, फरें पसारहिं हाथ। तुलसी स्वारथ मीत सब, परमारथ रघुनाथ॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
लहइ न फूटी कौड़िहू, को चाहै केहि काज। सो तुलसी महँगो कियो, राम ग़रीबनिवाज॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
राम भरत लछिमन ललित, सत्रु समन सुभ नाम। सुमिरत दसरथ सुवन सब, पूजहिं सब मन काम॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
जानि राम सेवा सरस, समुझि करब अनुमान। पुरुषा ते सेवक भए, हर ते भे हनुमान॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
रामहि सुमिरत रन भिरत, देत परत गुरु पायँ। तुलसी जिन्हहि न पुलक तनु, ते जग जीवत जाएँ॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
मीठो अरु कठवति भरो, रौंताई अरु छेम। स्वारथ परमारथ सुलभ, राम नाम के प्रेम॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
हरन अमंगल अघ अखिल, करन सकल कल्यान। रामनाम नित कहत हर, गावत बेद पुरान॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
रे मन सब सों निरस ह्वै, सरस राम सों होहि। भलो सिखावन देत है, निसि दिन तुलसी तोहि॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
रसना सांपिनी बदन बिल, जे न जपहिं हरिनाम। तुलसी प्रेम न राम सों, ताहि बिधाता बाम॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
जग ते रहु छत्तीस ह्वै, रामचरन छ: तीन। ‘तुलसी’ देखु विचारि हिय, है यह मतौ प्रबीन॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
हम लखि लखहि हमार लखि, हम हमार के बीच। तुलसी अलखहि का लखहि, राम नाम जप नीच॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
सीता लखन समेत प्रभु, सोहत तुलसीदास। हरषत सुर बरषत सुमन, सगुन सुमंगल बास॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
स्वामी होनो सहज है, दुर्लभ होनो दास। गाडर लाए ऊन को, लागी चरन कपास॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
‘तुलसी’ श्री रघुवीर तजि, करौ भरोसौ और। सुख संपति की का चली, नरकहुँ नाहीं ठौर॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
संकर प्रिय मम द्रोही, सिव द्रोही मम दास। ते नर करहिं कलप भरि, घोर नरक महुँ बास॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
जाति हीन अघ जन्म महि, मुक्त कोन्हि असि नारि। महामंद मन सुख चहसि, ऐसे प्रभुहि बिसारि॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
राम दूरि माया बढ़ति, घटति जानि मन माँह। भूरि होति रवि दूरि लखि, सिर पर पगतर छाँह॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
तुलसी हठि-हठि कहत नित, चित सुनि हित करि मानि। लाभ राम सुमिरन बड़ी, बड़ी बिसारें हानि॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
अनुदिन अवध बधावने, नित नव मंगल मोद। मुदित मातु-पितु लोग लखि, रघुवर बाल विनोद॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
तुलसी हरि अपमान तें, होइ अकाज समाज। राज करत रज मिलि गए, सदल सकुल कुरुराज॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
बिनु सतसंग न हरिकथा, तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु रामपद, होइ न दृढ़ अनुराग॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
घर-घर माँगे टूक पुनि, भूपति पूजे पाय। जे तुलसी तब राम बिनु, ते अब राम सहाय॥
तुलसीदास
1511 -1623
दोहा
null
काल करम गुन दोष जग, जीव तिहारे हाथ। तुलसी रघुबर रावरो, जानु जानकीनाथ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
झूठे अंधे गुर घणें, भरंम दिखावै आइ। दादू साचा गुर मिलै, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
हस्ती छूटा मन फिरै, क्यूँ ही बंध्या न जाइ। बहुत महावत पचि गये, दादू कछू न बसाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव। तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाव॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
जहाँ आतम तहाँ रांम है, सकल रह्या भरपूर। अंतर गति ल्यौ लाई रहु, दादू सेवग सूर॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
मीरां कीया मिहर सौं, परदे थैं लापरद। राखि लीया, दीदार मैं, दादू भूला दरद॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
मीठे मीठे करि लीये, मीठा माहें बाहि। दादू मीठा ह्वै रह्या, मीठे मांहि समाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
भरि भरि प्याला प्रेम रस, अपणैं हाथि पिलाइ। सतगुर के सदकै कीया, दादू बलि बलि जाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
केते पारिख जौंहरी, पंडित ग्याता ध्यांन। जांण्यां जाइ न जांणियें, का कहि कथिये ग्यांन॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू बिरहनि कुरलै कुंज ज्यूँ, निसदिन तलफत जाइ। रांम सनेही कारनैं, रोवत रैंनि बिहाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
आसिक मासूक ह्वै गया, इसक कहावै सोइ। दादू उस मासूक का, अलह आसिक होइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू रांम सँभालिये, जब लग सुखी सरीर। फिर पीछैं पछिताहिगा, जब तन मन धरै न धीर॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
इक लख चंदा आणि घर, सूरज कोटि मिलाइ। दादू गुर गोबिंद बिन, तो भी तिमर न जाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू हरदम मांहि, दिवांन, सेज हमारी पीव है। देखौं सो सुबहांन, ए इसक हमारा जीव है॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
भँवर कँवल रस बेधिया, सुख सरवर रस पीव। तह हंसा मोती चुणैँ, पिउ देखे सुख जीव॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू सिरजन हार के, केते नांव अनंत। चिति आवै सो लीजिए, यूँ साधू सुमिरैं संत॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू इस संसार में, मुझ सा दुखी न कोइ। पीव मिलन के कारनैं, मैं जल भरिया रोइ॥ ना बहु मिलै न मैं सुखी, कहु क्यूँ जीवनि होइ। जिनि मुझ कौं घाइल किया, मेरी दारू सोइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू इसक अलह की जाति है, इसक अलह का अंग। इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
पहली श्रवन दुती रसन, तृतीय हिरदै गाइ। चतुरदसी चेतनि भया, तब रोम रोम ल्यौ लाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ बसै माबूंद। तहाँ बंदे की बंदिगी, जहाँ रहै मौजूंद॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
पीव पुकारै बिरहणीं निस दिन रहै उदास। रांम रांम दादू कहै, तालाबेली प्यास॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, सुख सरवर सर पीव। तहाँ हंसा मोती चुणैं, पीव देखें सुख जीव॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू आसिक रबु दा, सिर भी डेवै लाहि। अलह कारणि आप कौं, साड़ै अंदरि भाहि॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू नमो नमो निरंजन, निमसकार गुरुदेवतह। बंदनं श्रब साधवा, प्रणामं पारंगतह॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
आसिकां रह कबज करदां, दिल वजां रफतंद। अलह आले नूर दीदंम, दिलह दादू बंद॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू दीवा है भला, दीवा करौ सब कोइ। घर में धर्या न पाइये, जे कर दीवा न होइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू सतगुरु मारे सबद सौं, निरखि निरखि निज ठौर। रांम अकेला रहि गया, चीति न आवै और॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू सतगुरु सौं सहजैं मिल्या, लीया कंठ लगाइ। दया भई दयाल की, तब दीपक दीया जगाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
वदन सीतल चंद्रमां, जल सीतल सब कोइ। दादू बिरही रांम का, इन सूं कदे न होइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू रांम तुम्हारे नांव बिनं जे मुख निकसै और। तौ इस अपराधी जीव कूँ, तीनि लोक कत ठौर॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
साहिब जी के नांव मां, सब कुछ भरे भंडार। नूर तेज अनंत है, दादू सिरजनहार॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
सब सुख मेरे सांइयां, मंगल अति आनंद। दादू सजन सब मिले, जब भेटे परमांनंद॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दादू देव दयाल की, गुरू दिखाई बाट। ताला कूँची लाइ करि, खोले सबै कपाट॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात। दीया जग में चाँदना, दीया चालै साथ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
अनेक चंद उदय करै, असंख सूर परकास। एक निरंजन नाँव बिन, दादू नहीं उजास॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
काया अंतर पाइया, त्रिकुटी के रे तीर। सहजै आप लखाइया, व्यापा सकल सरीर॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
मथि करि दीपक कीजिये, सब घट भया प्रकास। दादू दीया हाथ करि, गया निरंजन पास॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
जोग समाधि सुख सुरति सौं, सहजै-सहजै आव। मुक्ता द्वारा महल का, इहै भगति का भाव॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
सोधी दाता पलक में, तिरै तिरावन जोग। दादू ऐसा परम गुर, पाया कहिं संजोग॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
सब ही ज्ञानी पंडिता, सुर नर रहे उरभाइ। दादू गति गोबिंद की, क्यों ही लखी न जाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनं। निराकारं निर्मलं, तस्य दादू बंदनं॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
मुझ ही में मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ। आतम सों परआत्मा, परगट आणि मिलाइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
अति गति आतुर मिलन कौं, जैसे जल बिन मीन। सो देखै दीदार कौं, दादू आतम लीन॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
राम नाम उपदेस करि, अगम गवन यहु सैन। दादू सतगुर सब दिया, आप मिलाये ऐन॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
रतिवंती आरति करै, राम सनेही आव। दादू अवसर अब मिलै, यह बिरहिनि का भाव॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
साचा सतगुर जे मिलै, सब साज सँवारै। दादू नाव चढ़ाइ करि, ले पार उतारै॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
सबद दूध घृत राम रस, मथि करि काढ़े कोइ। दादू गुर गोविंद बिन, घट-घट समझि न होइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
सतगुर पसु माणस करै, माणस थें सिध सोइ। दादू सिध थें देवता, देव निरंजन होइ॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
देवै किरका दरद का, टूटा जोड़े तार। दादू साधै सुरति को, सो गुर पीर हमार॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
राम तुम्हारे नाँव बिन, जे मुख निकसे और। तौ इस अपराधी जीव कौं, तीन लोक कत ठौर॥
दादू दयाल
1544 -1603
दोहा
null
गैब माहिं गुरदेव मिल्या, पाया हम परसाद। मस्तक मेरे कर धर्या, देख्या अगम अगाध॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
भक्ति करे सो सूरमा, तन मन लज्जा खोय। छैल चिकनिया बिसनी, वा से भक्ति ना होय॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
प्रेम ज्ञान जब उपजे, चले जगत कंह झारी। कहे दरिया सतगुरु मिले, पारख करे सुधारी॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
माला टोपी भेष नहीं, नहीं सोना शृंगार। सदा भाव सतसंग है, जो कोई गहे करार॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
सुरति निरति नेता हुआ, मटुकी हुआ शरीर। दया दधि विचारिये, निकलत घृत तब थीर॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
जब लगि विरह न उपजे, हिये न उपजे प्रेम। तब लगि हाथ न आवहिं धरम किये व्रत नेम॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
निरखि परखि नीके गुरु कीजे, बेड़ा बांधु संभारी। कलि के गुरु बड़े प्रपंची, डारि ठगौरी मारी॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
जीव बधन राधन करे, साधन भैरो भूत। जन्म तुम्हारा मृथा है, श्वान सूकर का पूत॥
दरिया (बिहार वाले)
1634 -1780
दोहा
null
मरना-मरना सब कहे, मरिगौ बिरला कोय। एक बेरि एह ना मुआ, जो बहुरि ना मरना होय॥