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Poet's Name stringclasses 61
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values | Language stringclasses 3
values | Additional Info stringclasses 16
values | Poem Text stringlengths 66 168k ⌀ |
|---|---|---|---|---|
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | तुलसी परिहरि हरि हरहि, पाँवर पूजहिं भूत।
अंत फजीहत होहिंगे, गनिका के से पूत॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम।
मनहुँ पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | राम-नाम-मनि-दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
‘तुलसी’ भीतर बाहिरौ, जौ चाहसि उजियार॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | ‘तुलसी’ जस भवितव्यता, तैसी मिलै सहाय।
आपु न आवै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाय॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | रघुपति कीरति कामिनी, क्यों कहै तुलसीदासु।
सरद अकास प्रकास ससि, चार चिबुक तिल जासु॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | अमिय गारि गारेउ गरल, नारी करि करतार।
प्रेम बैर की जननि युग, जानहिं बुध न गँवार॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | दुर्जन दर्पण सम सदा, करि देखौ हिय गौर।
संमुख की गति और है, विमुख भए पर और॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | घर दीन्हे घर जात है, घर छोड़े घर जाय।
‘तुलसी’ घर बन बीच रहू, राम प्रेम-पुर छाय॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | बिनु विश्वास भगति नहीं, तेही बिनु द्रवहिं न राम।
राम-कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लहि विश्राम॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | गंगा जमुना सुरसती, सात सिंधु भरपूर।
‘तुलसी’ चातक के मते, बिन स्वाती सब धूर॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | ऊँची जाति पपीहरा, पियत न नीचौ नीर।
कै याचै घनश्याम सों, कै दु:ख सहै सरीर॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस।
बरसत बारिद बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | राम नाम रति राम गति, राम नाम बिस्वास।
सुमिरत सुभ मंगल कुसल, दुहुँ दिसि तुलसीदास॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | ‘तुलसी’ संत सुअंब तरु, फूलि फलहिं पर हेत।
इतते ये पाहन हनत, उतते वे फल देत॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | असन बसन सुत नारि सुख, पापिहुँ के घर होइ।
संत-समागम रामधन, ‘तुलसी’ दुर्लभ दोइ॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | राम भरोसो राम बल, राम नाम बिस्वास।
सुमिरत सुभ मंगल कुसल, मांगत तुलसीदास॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | नाम गरीबनिवाज को, राज देत जन जानि।
तुलसी मन परिहरत नहिं, धुरविनिआ की वानि॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | मान रखिवौ माँगिबौ, पिय सों सहज सनेहु।
‘तुलसी’ तीनों तब फबैं, जब चातक मत लेहु॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | हरे चरहिं तापहिं बरे, फरें पसारहिं हाथ।
तुलसी स्वारथ मीत सब, परमारथ रघुनाथ॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | लहइ न फूटी कौड़िहू, को चाहै केहि काज।
सो तुलसी महँगो कियो, राम ग़रीबनिवाज॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | राम भरत लछिमन ललित, सत्रु समन सुभ नाम।
सुमिरत दसरथ सुवन सब, पूजहिं सब मन काम॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | जानि राम सेवा सरस, समुझि करब अनुमान।
पुरुषा ते सेवक भए, हर ते भे हनुमान॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | रामहि सुमिरत रन भिरत, देत परत गुरु पायँ।
तुलसी जिन्हहि न पुलक तनु, ते जग जीवत जाएँ॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | मीठो अरु कठवति भरो, रौंताई अरु छेम।
स्वारथ परमारथ सुलभ, राम नाम के प्रेम॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | हरन अमंगल अघ अखिल, करन सकल कल्यान।
रामनाम नित कहत हर, गावत बेद पुरान॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | रे मन सब सों निरस ह्वै, सरस राम सों होहि।
भलो सिखावन देत है, निसि दिन तुलसी तोहि॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | रसना सांपिनी बदन बिल, जे न जपहिं हरिनाम।
तुलसी प्रेम न राम सों, ताहि बिधाता बाम॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | जग ते रहु छत्तीस ह्वै, रामचरन छ: तीन।
‘तुलसी’ देखु विचारि हिय, है यह मतौ प्रबीन॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | हम लखि लखहि हमार लखि, हम हमार के बीच।
तुलसी अलखहि का लखहि, राम नाम जप नीच॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | सीता लखन समेत प्रभु, सोहत तुलसीदास।
हरषत सुर बरषत सुमन, सगुन सुमंगल बास॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | स्वामी होनो सहज है, दुर्लभ होनो दास।
गाडर लाए ऊन को, लागी चरन कपास॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | ‘तुलसी’ श्री रघुवीर तजि, करौ भरोसौ और।
सुख संपति की का चली, नरकहुँ नाहीं ठौर॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | संकर प्रिय मम द्रोही, सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि, घोर नरक महुँ बास॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | जाति हीन अघ जन्म महि, मुक्त कोन्हि असि नारि।
महामंद मन सुख चहसि, ऐसे प्रभुहि बिसारि॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | राम दूरि माया बढ़ति, घटति जानि मन माँह।
भूरि होति रवि दूरि लखि, सिर पर पगतर छाँह॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | तुलसी हठि-हठि कहत नित, चित सुनि हित करि मानि।
लाभ राम सुमिरन बड़ी, बड़ी बिसारें हानि॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | अनुदिन अवध बधावने, नित नव मंगल मोद।
मुदित मातु-पितु लोग लखि, रघुवर बाल विनोद॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | तुलसी हरि अपमान तें, होइ अकाज समाज।
राज करत रज मिलि गए, सदल सकुल कुरुराज॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | बिनु सतसंग न हरिकथा, तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु रामपद, होइ न दृढ़ अनुराग॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | घर-घर माँगे टूक पुनि, भूपति पूजे पाय।
जे तुलसी तब राम बिनु, ते अब राम सहाय॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | काल करम गुन दोष जग, जीव तिहारे हाथ।
तुलसी रघुबर रावरो, जानु जानकीनाथ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | झूठे अंधे गुर घणें, भरंम दिखावै आइ।
दादू साचा गुर मिलै, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | हस्ती छूटा मन फिरै, क्यूँ ही बंध्या न जाइ।
बहुत महावत पचि गये, दादू कछू न बसाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव।
तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाव॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | जहाँ आतम तहाँ रांम है, सकल रह्या भरपूर।
अंतर गति ल्यौ लाई रहु, दादू सेवग सूर॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | मीरां कीया मिहर सौं, परदे थैं लापरद।
राखि लीया, दीदार मैं, दादू भूला दरद॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | मीठे मीठे करि लीये, मीठा माहें बाहि।
दादू मीठा ह्वै रह्या, मीठे मांहि समाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | भरि भरि प्याला प्रेम रस, अपणैं हाथि पिलाइ।
सतगुर के सदकै कीया, दादू बलि बलि जाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | केते पारिख जौंहरी, पंडित ग्याता ध्यांन।
जांण्यां जाइ न जांणियें, का कहि कथिये ग्यांन॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू बिरहनि कुरलै कुंज ज्यूँ, निसदिन तलफत जाइ।
रांम सनेही कारनैं, रोवत रैंनि बिहाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | आसिक मासूक ह्वै गया, इसक कहावै सोइ।
दादू उस मासूक का, अलह आसिक होइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू रांम सँभालिये, जब लग सुखी सरीर।
फिर पीछैं पछिताहिगा, जब तन मन धरै न धीर॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | इक लख चंदा आणि घर, सूरज कोटि मिलाइ।
दादू गुर गोबिंद बिन, तो भी तिमर न जाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू हरदम मांहि, दिवांन, सेज हमारी पीव है।
देखौं सो सुबहांन, ए इसक हमारा जीव है॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | भँवर कँवल रस बेधिया, सुख सरवर रस पीव।
तह हंसा मोती चुणैँ, पिउ देखे सुख जीव॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू सिरजन हार के, केते नांव अनंत।
चिति आवै सो लीजिए, यूँ साधू सुमिरैं संत॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू इस संसार में, मुझ सा दुखी न कोइ।
पीव मिलन के कारनैं, मैं जल भरिया रोइ॥
ना बहु मिलै न मैं सुखी, कहु क्यूँ जीवनि होइ।
जिनि मुझ कौं घाइल किया, मेरी दारू सोइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू इसक अलह की जाति है, इसक अलह का अंग।
इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | पहली श्रवन दुती रसन, तृतीय हिरदै गाइ।
चतुरदसी चेतनि भया, तब रोम रोम ल्यौ लाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ बसै माबूंद।
तहाँ बंदे की बंदिगी, जहाँ रहै मौजूंद॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | पीव पुकारै बिरहणीं निस दिन रहै उदास।
रांम रांम दादू कहै, तालाबेली प्यास॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू भँवर कँवल रस बेधिया, सुख सरवर सर पीव।
तहाँ हंसा मोती चुणैं, पीव देखें सुख जीव॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू आसिक रबु दा, सिर भी डेवै लाहि।
अलह कारणि आप कौं, साड़ै अंदरि भाहि॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू नमो नमो निरंजन, निमसकार गुरुदेवतह।
बंदनं श्रब साधवा, प्रणामं पारंगतह॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | आसिकां रह कबज करदां, दिल वजां रफतंद।
अलह आले नूर दीदंम, दिलह दादू बंद॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू दीवा है भला, दीवा करौ सब कोइ।
घर में धर्या न पाइये, जे कर दीवा न होइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू सतगुरु मारे सबद सौं, निरखि निरखि निज ठौर।
रांम अकेला रहि गया, चीति न आवै और॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू सतगुरु सौं सहजैं मिल्या, लीया कंठ लगाइ।
दया भई दयाल की, तब दीपक दीया जगाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | वदन सीतल चंद्रमां, जल सीतल सब कोइ।
दादू बिरही रांम का, इन सूं कदे न होइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू रांम तुम्हारे नांव बिनं जे मुख निकसै और।
तौ इस अपराधी जीव कूँ, तीनि लोक कत ठौर॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | साहिब जी के नांव मां, सब कुछ भरे भंडार।
नूर तेज अनंत है, दादू सिरजनहार॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | सब सुख मेरे सांइयां, मंगल अति आनंद।
दादू सजन सब मिले, जब भेटे परमांनंद॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दादू देव दयाल की, गुरू दिखाई बाट।
ताला कूँची लाइ करि, खोले सबै कपाट॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात।
दीया जग में चाँदना, दीया चालै साथ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | अनेक चंद उदय करै, असंख सूर परकास।
एक निरंजन नाँव बिन, दादू नहीं उजास॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | काया अंतर पाइया, त्रिकुटी के रे तीर।
सहजै आप लखाइया, व्यापा सकल सरीर॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | मथि करि दीपक कीजिये, सब घट भया प्रकास।
दादू दीया हाथ करि, गया निरंजन पास॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | जोग समाधि सुख सुरति सौं, सहजै-सहजै आव।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भगति का भाव॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | सोधी दाता पलक में, तिरै तिरावन जोग।
दादू ऐसा परम गुर, पाया कहिं संजोग॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | सब ही ज्ञानी पंडिता, सुर नर रहे उरभाइ।
दादू गति गोबिंद की, क्यों ही लखी न जाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनं।
निराकारं निर्मलं, तस्य दादू बंदनं॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | मुझ ही में मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ।
आतम सों परआत्मा, परगट आणि मिलाइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | अति गति आतुर मिलन कौं, जैसे जल बिन मीन।
सो देखै दीदार कौं, दादू आतम लीन॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | राम नाम उपदेस करि, अगम गवन यहु सैन।
दादू सतगुर सब दिया, आप मिलाये ऐन॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | रतिवंती आरति करै, राम सनेही आव।
दादू अवसर अब मिलै, यह बिरहिनि का भाव॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | साचा सतगुर जे मिलै, सब साज सँवारै।
दादू नाव चढ़ाइ करि, ले पार उतारै॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | सबद दूध घृत राम रस, मथि करि काढ़े कोइ।
दादू गुर गोविंद बिन, घट-घट समझि न होइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | सतगुर पसु माणस करै, माणस थें सिध सोइ।
दादू सिध थें देवता, देव निरंजन होइ॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | देवै किरका दरद का, टूटा जोड़े तार।
दादू साधै सुरति को, सो गुर पीर हमार॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | राम तुम्हारे नाँव बिन, जे मुख निकसे और।
तौ इस अपराधी जीव कौं, तीन लोक कत ठौर॥ |
दादू दयाल | 1544 -1603 | दोहा | null | गैब माहिं गुरदेव मिल्या, पाया हम परसाद।
मस्तक मेरे कर धर्या, देख्या अगम अगाध॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | भक्ति करे सो सूरमा, तन मन लज्जा खोय।
छैल चिकनिया बिसनी, वा से भक्ति ना होय॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | प्रेम ज्ञान जब उपजे, चले जगत कंह झारी।
कहे दरिया सतगुरु मिले, पारख करे सुधारी॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | माला टोपी भेष नहीं, नहीं सोना शृंगार।
सदा भाव सतसंग है, जो कोई गहे करार॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | सुरति निरति नेता हुआ, मटुकी हुआ शरीर।
दया दधि विचारिये, निकलत घृत तब थीर॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | जब लगि विरह न उपजे, हिये न उपजे प्रेम।
तब लगि हाथ न आवहिं धरम किये व्रत नेम॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | निरखि परखि नीके गुरु कीजे, बेड़ा बांधु संभारी।
कलि के गुरु बड़े प्रपंची, डारि ठगौरी मारी॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | जीव बधन राधन करे, साधन भैरो भूत।
जन्म तुम्हारा मृथा है, श्वान सूकर का पूत॥ |
दरिया (बिहार वाले) | 1634 -1780 | दोहा | null | मरना-मरना सब कहे, मरिगौ बिरला कोय।
एक बेरि एह ना मुआ, जो बहुरि ना मरना होय॥ |
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