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Poet's Name
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40 values
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3 values
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16 values
Poem Text
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66
168k
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
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श्री गोबिंद के गुनन तेहिं, भनत रहौ दिन-रैन। 'दया' दया गुरदेव की, जासूँ होय सुबैन॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
जहाँ जाय मन मिटत है, ऐसो तत्त सरूप। अचरज देखि 'दया' करै, बंदन भाव अनूप॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
चरनदास गुरुदेव जू, ब्रह्म-रूप सुख-धाम। ताप-हरन सब सुख-करन, 'दया' करत परनाम॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
साध साध सब कोउ कहै, दुर्लभ साधू सेव। जब संगति है साध की, तब पावे सब भेव॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
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'दया' प्रेम प्रगट्यौ तिन्हैं, तन की तनि न संभार। हरि रस में माते फिरैं, गृह बन कौन बिचार॥
दयाबाई
1693 -1773
दोहा
null
हरि भजते लागै नहीं, काल-व्याल दुख-झाल। ता तें राम सँभालिये, 'दया' छोड़ जग-जाल॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
लाल लली ललि लाल की, लै लागी लखि लोल। त्याय दे री लय लायकर, दुहु कहि सुनि चित डोल॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
चकमक सु परस्पर नयन, लगन प्रेम परि आगि। सुलगि सोगठा रूप पुनि, गुन-दारू दूड जागि॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
ऐसो मीठो नहिं पियुस, नहिं मिसरी नहिं दाख। तनक प्रेम माधुर्य पें, नोंछावर अस लाख॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
गोकुल ब्रंदावन लिहू, मोपें जुगजीवन्न। पलटें मोको देहु फिर, गोकुल ब्रंदाबन्न॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
बिरहारति तें रति बढ़ै, पै रुचि बढन न कोय। प्यासो ज़ख्मी जिए तहूँ, लह्यो न त्यागें तोय॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
सहज संवारत सरस छब, अलि सो का सुच होत। सुनि सुख तो लखि लाल मो, मुद मोहन चित पोत॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
रति बिन रस सो रसहिसों, रति बिन जान सुजान। रति बिन मित्र सु मित्रसो, रति बिन सब शव मान॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
कटि सों मद रति बेनि अलि, चखसि बड़ाई धारि। कुच से बच अखि ओठ भों, मग गति मतिहि बिसारि॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
दीठी दुरिजन की लगें, सब कहि मो न पत्याय। एसी सज्जन की लगे, प्रानसंग निठ जाय॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
प्यारे मोकौं तीर दिहु, पै जिन देहु कमान। कमांन लागत तीर सैम, तीर लगत प्रियप्रांन॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
चूक जीव कों धरम है, छमा धरम प्रभु आप। आयो शरन निवाजि निज, करि हरियें संताप॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
मोहि मोह तुम मोह को, मोह न मो कहुँ धारि। मोहन मोह न वारियें, मोहनि मोह निवारि॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
असि माया मोपर करो, चलें न माया ज़ोर। माया मायारहित दिहू, निज पद नंदकिशोर॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
मो उर में निज प्रेम अस, परिदृढ़ अचलित देहू। जैसे लोटन-दीप सों, सरक न ढुरक सनेहु॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
समता सब बिधि नेह अति, तृप्ति न अचल मिलाप। दुहु कों निर्भय यह त्हरें, पैयें दें हरिं आप॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
बीच अमल का समल बिच, दोहु कलेजों खाय। दीठि असित तें सित बुरी, कछू न जाहि उपाय॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
कटाछ नोक चुभी कियों, गडे उरोज कठोर। कें कटि छोटी में हितू, रुची न नंदकिशोर॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
सोई भाजन प्रेमरस, प्रकट कृष्ण के गात्र। पय पुंडरिकनी को न जो, रहि बिन कंचन पात्र॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
प्रीत निभाई द्वे सकें, इकसु न निबहनहारि। देखी सुनि न कहु बजी, एक हाथ सूं तारि॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
पीर न न्यारी मेन ए, नारी नारी में न। अली अयानों भिषक ए, इशक-किशक समुझें न॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
नोंघा प्होंप सुगंधि ते, हरि हरि मन सुच पाय। दसई पंकज प्रेम बिन, रुके कहूँ नहिं जाय॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
पीतांबर परिधान प्रभु, राधा नील निचोल। अंग रंग सँग परस्पर, यों सब हारद तोल॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
मुकर मुकर सब वस्तु भई, नयन अयन किय लाल। दृग पसारूँ जित-जित अली, तित-तित लखूँ गुपाल॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
करें सहोदर ते सरस, दे बिसराई बेर। प्रेमी पानी परस तें, सुधा सरस हुई झेर॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
दीनबंधु अधमुद्धरन, नाम ग़रीब निवाज़। यह सब में मैं कोन जो, सुधि न लेत ब्रजराज॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
हरि हरिवदनी सों लिख्यौं, हम ध्यावत तुम ध्याउ। का चिंता हम तुम बनें, तुम हमसे ह्वै जाउ॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
स्यामा स्याम पुकारती, स्यामा रटते स्याम। अली अचंभो आज बड, जुगल जपत निज नाम॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
प्यारी प्रीतम सों लिख्यौं, मत परियौ मौ ध्यान। तुम मोसे ह्वै जाउगे, करिहों का पें मान॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
आगी ते बेली बढ़े, जल सींचत कुमलाय। सिर के पलटें फल मिलें, मुख बिन खायो जाए॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
सहि न परे रुझ बिबि दई, मिलन कठिन अति नेहु। मिति मिलाप निति सुगम दें, नांतर प्रीती लेहु॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
बड़ कौतिक इक ए दिख्यों, रति आरति ही रूप। तामें होत प्रतीति सुख, निपुन रंक का भूप॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
लह्यों प्रेम जब जानिये, विरह विकल तम दीन। कुछ न कहूँ सुहाय छिनु, दुति पे होई अधीन॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
अनल भखे शशि रति हितू, चकोर गिनत न ताप। भस्म होई भवभाल लगु, हुइ कबु मित्त मिलाप॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
लही न अंत अकास कहूँ, चिंतामनी न मोल। संख्या नाहीं जीउ की, तेसे प्रेम अतोल॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
प्रीती ह्वा नीति नहीं, नीती ह्वा नहिं प्रीत। स्यानप अरु मदछाक जिमि, नहिं इकत्र कहु रीत॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
कृपन होत क्यों कृपाकर, तनक देत नहिं खोट। दीनपात्र हों दिहू दया, दान खांन इक कोट॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
झां मन बेली ह्वां न श्रम, ब्रिड प्रमाद अघ भीति। धन तन जीवन सहज दे, भै चित प्रीति प्रतीति॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
मिलतहु दुख बिछरतहु दुख, सुख प्रिय अचल मिलाप। सुन पतंग सारिंग ज्यों, कहा जुड़ाव निति ताप॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
रति चहलें मातंग मन, फस्यो न निकसन पाय। बल करि निकस्यो चहत है, त्यों-त्यों धसत ही जाय॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
व्याध फंद मृग परतु है, बंध अहेरी ह्वे न। प्रेम अजब बागूर में, पारनहार बचें न॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
योग यज्ञ जप तप तिरिथ, ग्यांन धरम व्रत नेम। बिहिन वल्लवी वल्लभा, करि हरि इक बल प्रेम॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
प्रीती सो सहराइयें, असु अनन्य द्वे अंग। गति इक की सों ओंर की, जिमि कारंड विहंग॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
सोइ नेह नदलाल में, प्रकटि न पावें जान। जस असि सूराचित्र कों, एंच्यो होइ न म्यान॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
व्रिड सुधि बुधि बल लखतही, माशुक आशुक जाय। अलि कठोर ज्यों बस कट, मृदु सरोज मुरझाय॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
मोहन मन द्वें हें अजित, सब कहि साँची बात। सोऊ सदबस प्रेम के, सहज अती ह्वेँ जात॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
जद्यपि रवि आतप भयों, पीतल लगत सरोज। सकुचें लखि सो सुधाकर, समुझ प्रेम की चोज॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
होत प्रीति नीको लगें, फिरि अरि त्यौं ले प्राण। कुंभिनि निगलत जख म दुख, पाछे ज्यों निय ज्यान॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
राखि साखि गत लाख करि, बही न लहि को फीर। कोटि जतन जिमि ना मिलें, गयो मुक्त को नीर॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
देखि जिएँ परसि न छूटें, माशुक आशक धन्य। जैसे लोह चमक लगी, टरे न लखि चैतन्य॥
दयाराम
1833 -1909
दोहा
null
रसिक नैन नाराच की, अजब अनोखी रीत। दुसमन को परसे नहीं, मारे अपनो मीत॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
साधुन की निंदा बिना, नहीं नीच बिरमात। पियत सकल रस काग खल, बिनु मल नहीं अघात॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
बड़े बड़न के भार कों, सहैं न अधम गँवार। साल तरुन मैं गज बँधै, नहि आँकन की डार॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
गये असज्जन की सभा, बुध महिमा नहिं होय। जिमि कागन की मंडली, हंस न सोहत कोय॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
कीजै सत उपकार को, खल मानै नहिं कोय। कंचन घट पै सींचिए, नींब न मीठो होय॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
खल जन को विद्या मिलै, दिन-दिन बढ़ै गुमान। बढ़ै गरल बहु भुजंग कों, जथा किये पयपान॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
तहाँ नहीं कछु भय जहाँ, अपनी जाति न पास। काठ बिना न कुठार कहुँ, तरु को करत बिनास॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
होत वृथा हरि भजन बिन, जनम जगत के माहिं। जथा विपिन मैं मालती, फूलि-फूलि भरि जाहिं॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
कोप न करैं महान हिय, पाय खलन तें दूख। लौन सींचि कर पीड़िए, तऊ मधुर रस ऊख॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
झषै कहा अब ह्वै सखे, भयो सिथिल या देह। कूप खोदिबो है वृथा, लग्यो जरन जब गेह॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
जैसे जल लै बाग को, सिंचत मालाकार। तैसे निज जन को सदा, पालत नंदकुमार॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
पीछे निन्दा जो करें, अरु मुख पैं सनमान। तजिए ऐसे मीत को, जैसे ठग-पकवान॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
प्रीति सुखद है सजन की, दिन-दिन होय विशेष। कबहूँ मेटे ना मिटै, ज्यों पाहन की रेष॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
हिये सुमिरि गोविंद कौं, नास होय सब लोग। जा रसायन ते नसै, सनै-सनै ही रोग॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
रजत सीप मैं रजु भुजंग, जथा सुपन धन धाम। तथा वृथा भ्रम रूप जग, साँच चिदातम राम॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
नीच बड़न के संग तें, पदवी लहत अतोल। परे सीप में जलद जल, मुकुता होत अमोल॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
खल जन रहैं कुसंग मैं, करि उमंग सो बास। ज्यों वायस मलकुंड मैं, करि-करि रमै हुलास॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
भाषत धीर सरीर को, नहीं छनक इतबार। ज्यों तरु सरिता तीर को, गिरत न लागै बार॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
चिदानन्द की सकति तें, मन इंद्रिन को भोग। होत जथा रवि के उदै, क्रिया करे सब लोग॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
हरि करुना बिन जगत मैं, पूरी परै न आस। मृग सरिता पय पान करि, गई कौन की प्यास॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
लखि स्वरूप बुध जगत मैं, रमैं विलच्छन रीत। मिलत न पूरबवत जथा, छीर माँहि नवनीत॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
सठ सुधरैं सतसंग तें, गये बहुत बुध भाषि। जैसे मलै प्रसंग तें, चंदन होहिं कुसाखि॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
प्रभु प्रेरक सब जगत को, नट नागर गोविंद। ज्यों नट पट के गोट ह्वै, नटी नचावत वृंद॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
दारिद सुरतरु ताप ससि, हरै सुरसरी पाप। साधु समागम तिहु हरे, पाप दीनता ताप॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
प्रभु पूरन मति शुद्ध बिनु, सब मैं ह्वै न प्रकास। विमल बिना प्रतिबिंब को, जैसे होय न भास॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
सबै काम सुधरैं जबै, करैं कृपा श्रीराम। जैसे कृषि किसान की, उपजावे घन स्याम॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
किए करम विपरीत तऊ, तऊ संत सोभंत। नील कंठ भे खाय विष, शिव छवि लहत अनंत॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
परधीनता दुख महा, सुख जग मैं स्वाधीन। सुखी रमत सुक बन विषे, कनक पींजरे दीन॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
सुपन रूप संसार है, मोह नींद के माहिं। बोध रूप जागे बिना, ताके दुख नहहिं जाहिं॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
एकै सबही मैं बस्यो, वासुदेव करि वास। ज्यों घट मठ भीतर बहिर, पूर्यो एक अकास॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
राजभ्रष्ट लखि भूप कों, त्यागि जाहिं सब दास। ज्यों सर सूखो देखि कै, हँस न आवत पास॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
सन बंधन को संग है, जग मैं छनक विचारि। मिलै कूप पर आनि ज्यों, घर-घर तें पनिहारि॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
साधु नहूँ को होय दुख, संग गहे अति खोट। घटी पात्र जल को हरै, परै घड़ी पर चोट॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
बुध के मृदु उपदेश कों, खल त्यागें ततकाल। तुरित बिनासै तोरि कपि, जथा सुमन की माल॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
गुन तें होत प्रधान जग, और ऊँच ते नाहिं। हरि हित अति से मालती, तथा न सेमल जाहिं॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
सील सुमति सरधा बिना, बुध सँग सठ सुधरैं न। होहिं न सुजन पिसाच गन, शिवहि सेइ दिन रैन॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
नहिं धन धन है बुध कहैं, विद्या वित्त अनूप। चोरि सकै नहिं चोरऊ, छोरि सकै नहिं भूप॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
प्रियवादी प्रियलोक मैं, तैसे नहिं कटु बैन। पिक प्रिय तथा उलूक सों, कोऊ प्रीति करै न॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
साधन बर है मुकुति को, जान कहै मुनि वाक। जैसे पावक के बिना, सिद्ध होत नहिं पाक॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
करम करैं कोऊ अशुभ, लगै संग बसि काहु। जथा चार संबन्ध ते, बंध होत है साहु॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
गुन प्रभुता पदवी, जहाँ तहाँ बनै सब कार। मिलै न कछु फल आँक तें, बजे नाम मंदार॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
तासों नहिं कछु होत जो, बकैं वृथा बहु बार। पूरन जल बरसे नहीं, ज्यों घन गरजनहार॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
जाको प्रभुता से बड़ो, नहिं वर कुल अवतार। कुंभ कूप कों नहिं पियो, कुंभज सिंधु अपार॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
चतुरंगिनी समेटि दल, कायर नर भजि जात। एक सूर सब सैन कों, रोकि लेत न डरात॥
दीनदयाल गिरि
1802 -1858
दोहा
null
इक बाहर इक भीतर, इक मृद दुहु दिसि पूर। सोहत नर जग त्रिविधि ज्यों, बेर बदाम अँगूर॥