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Poet's Name stringclasses 61
values | Period stringclasses 40
values | Language stringclasses 3
values | Additional Info stringclasses 16
values | Poem Text stringlengths 66 168k ⌀ |
|---|---|---|---|---|
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | श्री गोबिंद के गुनन तेहिं, भनत रहौ दिन-रैन।
'दया' दया गुरदेव की, जासूँ होय सुबैन॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | जहाँ जाय मन मिटत है, ऐसो तत्त सरूप।
अचरज देखि 'दया' करै, बंदन भाव अनूप॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | चरनदास गुरुदेव जू, ब्रह्म-रूप सुख-धाम।
ताप-हरन सब सुख-करन, 'दया' करत परनाम॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | साध साध सब कोउ कहै, दुर्लभ साधू सेव।
जब संगति है साध की, तब पावे सब भेव॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | 'दया' प्रेम प्रगट्यौ तिन्हैं, तन की तनि न संभार।
हरि रस में माते फिरैं, गृह बन कौन बिचार॥ |
दयाबाई | 1693 -1773 | दोहा | null | हरि भजते लागै नहीं, काल-व्याल दुख-झाल।
ता तें राम सँभालिये, 'दया' छोड़ जग-जाल॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | लाल लली ललि लाल की, लै लागी लखि लोल।
त्याय दे री लय लायकर, दुहु कहि सुनि चित डोल॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | चकमक सु परस्पर नयन, लगन प्रेम परि आगि।
सुलगि सोगठा रूप पुनि, गुन-दारू दूड जागि॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | ऐसो मीठो नहिं पियुस, नहिं मिसरी नहिं दाख।
तनक प्रेम माधुर्य पें, नोंछावर अस लाख॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | गोकुल ब्रंदावन लिहू, मोपें जुगजीवन्न।
पलटें मोको देहु फिर, गोकुल ब्रंदाबन्न॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | बिरहारति तें रति बढ़ै, पै रुचि बढन न कोय।
प्यासो ज़ख्मी जिए तहूँ, लह्यो न त्यागें तोय॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | सहज संवारत सरस छब, अलि सो का सुच होत।
सुनि सुख तो लखि लाल मो, मुद मोहन चित पोत॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | रति बिन रस सो रसहिसों, रति बिन जान सुजान।
रति बिन मित्र सु मित्रसो, रति बिन सब शव मान॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | कटि सों मद रति बेनि अलि, चखसि बड़ाई धारि।
कुच से बच अखि ओठ भों, मग गति मतिहि बिसारि॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | दीठी दुरिजन की लगें, सब कहि मो न पत्याय।
एसी सज्जन की लगे, प्रानसंग निठ जाय॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | प्यारे मोकौं तीर दिहु, पै जिन देहु कमान।
कमांन लागत तीर सैम, तीर लगत प्रियप्रांन॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | चूक जीव कों धरम है, छमा धरम प्रभु आप।
आयो शरन निवाजि निज, करि हरियें संताप॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | मोहि मोह तुम मोह को, मोह न मो कहुँ धारि।
मोहन मोह न वारियें, मोहनि मोह निवारि॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | असि माया मोपर करो, चलें न माया ज़ोर।
माया मायारहित दिहू, निज पद नंदकिशोर॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | मो उर में निज प्रेम अस, परिदृढ़ अचलित देहू।
जैसे लोटन-दीप सों, सरक न ढुरक सनेहु॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | समता सब बिधि नेह अति, तृप्ति न अचल मिलाप।
दुहु कों निर्भय यह त्हरें, पैयें दें हरिं आप॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | बीच अमल का समल बिच, दोहु कलेजों खाय।
दीठि असित तें सित बुरी, कछू न जाहि उपाय॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | कटाछ नोक चुभी कियों, गडे उरोज कठोर।
कें कटि छोटी में हितू, रुची न नंदकिशोर॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | सोई भाजन प्रेमरस, प्रकट कृष्ण के गात्र।
पय पुंडरिकनी को न जो, रहि बिन कंचन पात्र॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | प्रीत निभाई द्वे सकें, इकसु न निबहनहारि।
देखी सुनि न कहु बजी, एक हाथ सूं तारि॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | पीर न न्यारी मेन ए, नारी नारी में न।
अली अयानों भिषक ए, इशक-किशक समुझें न॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | नोंघा प्होंप सुगंधि ते, हरि हरि मन सुच पाय।
दसई पंकज प्रेम बिन, रुके कहूँ नहिं जाय॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | पीतांबर परिधान प्रभु, राधा नील निचोल।
अंग रंग सँग परस्पर, यों सब हारद तोल॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | मुकर मुकर सब वस्तु भई, नयन अयन किय लाल।
दृग पसारूँ जित-जित अली, तित-तित लखूँ गुपाल॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | करें सहोदर ते सरस, दे बिसराई बेर।
प्रेमी पानी परस तें, सुधा सरस हुई झेर॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | दीनबंधु अधमुद्धरन, नाम ग़रीब निवाज़।
यह सब में मैं कोन जो, सुधि न लेत ब्रजराज॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | हरि हरिवदनी सों लिख्यौं, हम ध्यावत तुम ध्याउ।
का चिंता हम तुम बनें, तुम हमसे ह्वै जाउ॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | स्यामा स्याम पुकारती, स्यामा रटते स्याम।
अली अचंभो आज बड, जुगल जपत निज नाम॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | प्यारी प्रीतम सों लिख्यौं, मत परियौ मौ ध्यान।
तुम मोसे ह्वै जाउगे, करिहों का पें मान॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | आगी ते बेली बढ़े, जल सींचत कुमलाय।
सिर के पलटें फल मिलें, मुख बिन खायो जाए॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | सहि न परे रुझ बिबि दई, मिलन कठिन अति नेहु।
मिति मिलाप निति सुगम दें, नांतर प्रीती लेहु॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | बड़ कौतिक इक ए दिख्यों, रति आरति ही रूप।
तामें होत प्रतीति सुख, निपुन रंक का भूप॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | लह्यों प्रेम जब जानिये, विरह विकल तम दीन।
कुछ न कहूँ सुहाय छिनु, दुति पे होई अधीन॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | अनल भखे शशि रति हितू, चकोर गिनत न ताप।
भस्म होई भवभाल लगु, हुइ कबु मित्त मिलाप॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | लही न अंत अकास कहूँ, चिंतामनी न मोल।
संख्या नाहीं जीउ की, तेसे प्रेम अतोल॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | प्रीती ह्वा नीति नहीं, नीती ह्वा नहिं प्रीत।
स्यानप अरु मदछाक जिमि, नहिं इकत्र कहु रीत॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | कृपन होत क्यों कृपाकर, तनक देत नहिं खोट।
दीनपात्र हों दिहू दया, दान खांन इक कोट॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | झां मन बेली ह्वां न श्रम, ब्रिड प्रमाद अघ भीति।
धन तन जीवन सहज दे, भै चित प्रीति प्रतीति॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | मिलतहु दुख बिछरतहु दुख, सुख प्रिय अचल मिलाप।
सुन पतंग सारिंग ज्यों, कहा जुड़ाव निति ताप॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | रति चहलें मातंग मन, फस्यो न निकसन पाय।
बल करि निकस्यो चहत है, त्यों-त्यों धसत ही जाय॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | व्याध फंद मृग परतु है, बंध अहेरी ह्वे न।
प्रेम अजब बागूर में, पारनहार बचें न॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | योग यज्ञ जप तप तिरिथ, ग्यांन धरम व्रत नेम।
बिहिन वल्लवी वल्लभा, करि हरि इक बल प्रेम॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | प्रीती सो सहराइयें, असु अनन्य द्वे अंग।
गति इक की सों ओंर की, जिमि कारंड विहंग॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | सोइ नेह नदलाल में, प्रकटि न पावें जान।
जस असि सूराचित्र कों, एंच्यो होइ न म्यान॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | व्रिड सुधि बुधि बल लखतही, माशुक आशुक जाय।
अलि कठोर ज्यों बस कट, मृदु सरोज मुरझाय॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | मोहन मन द्वें हें अजित, सब कहि साँची बात।
सोऊ सदबस प्रेम के, सहज अती ह्वेँ जात॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | जद्यपि रवि आतप भयों, पीतल लगत सरोज।
सकुचें लखि सो सुधाकर, समुझ प्रेम की चोज॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | होत प्रीति नीको लगें, फिरि अरि त्यौं ले प्राण।
कुंभिनि निगलत जख म दुख, पाछे ज्यों निय ज्यान॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | राखि साखि गत लाख करि, बही न लहि को फीर।
कोटि जतन जिमि ना मिलें, गयो मुक्त को नीर॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | देखि जिएँ परसि न छूटें, माशुक आशक धन्य।
जैसे लोह चमक लगी, टरे न लखि चैतन्य॥ |
दयाराम | 1833 -1909 | दोहा | null | रसिक नैन नाराच की, अजब अनोखी रीत।
दुसमन को परसे नहीं, मारे अपनो मीत॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | साधुन की निंदा बिना, नहीं नीच बिरमात।
पियत सकल रस काग खल, बिनु मल नहीं अघात॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | बड़े बड़न के भार कों, सहैं न अधम गँवार।
साल तरुन मैं गज बँधै, नहि आँकन की डार॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | गये असज्जन की सभा, बुध महिमा नहिं होय।
जिमि कागन की मंडली, हंस न सोहत कोय॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | कीजै सत उपकार को, खल मानै नहिं कोय।
कंचन घट पै सींचिए, नींब न मीठो होय॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | खल जन को विद्या मिलै, दिन-दिन बढ़ै गुमान।
बढ़ै गरल बहु भुजंग कों, जथा किये पयपान॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | तहाँ नहीं कछु भय जहाँ, अपनी जाति न पास।
काठ बिना न कुठार कहुँ, तरु को करत बिनास॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | होत वृथा हरि भजन बिन, जनम जगत के माहिं।
जथा विपिन मैं मालती, फूलि-फूलि भरि जाहिं॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | कोप न करैं महान हिय, पाय खलन तें दूख।
लौन सींचि कर पीड़िए, तऊ मधुर रस ऊख॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | झषै कहा अब ह्वै सखे, भयो सिथिल या देह।
कूप खोदिबो है वृथा, लग्यो जरन जब गेह॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | जैसे जल लै बाग को, सिंचत मालाकार।
तैसे निज जन को सदा, पालत नंदकुमार॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | पीछे निन्दा जो करें, अरु मुख पैं सनमान।
तजिए ऐसे मीत को, जैसे ठग-पकवान॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | प्रीति सुखद है सजन की, दिन-दिन होय विशेष।
कबहूँ मेटे ना मिटै, ज्यों पाहन की रेष॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | हिये सुमिरि गोविंद कौं, नास होय सब लोग।
जा रसायन ते नसै, सनै-सनै ही रोग॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | रजत सीप मैं रजु भुजंग, जथा सुपन धन धाम।
तथा वृथा भ्रम रूप जग, साँच चिदातम राम॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | नीच बड़न के संग तें, पदवी लहत अतोल।
परे सीप में जलद जल, मुकुता होत अमोल॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | खल जन रहैं कुसंग मैं, करि उमंग सो बास।
ज्यों वायस मलकुंड मैं, करि-करि रमै हुलास॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | भाषत धीर सरीर को, नहीं छनक इतबार।
ज्यों तरु सरिता तीर को, गिरत न लागै बार॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | चिदानन्द की सकति तें, मन इंद्रिन को भोग।
होत जथा रवि के उदै, क्रिया करे सब लोग॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | हरि करुना बिन जगत मैं, पूरी परै न आस।
मृग सरिता पय पान करि, गई कौन की प्यास॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | लखि स्वरूप बुध जगत मैं, रमैं विलच्छन रीत।
मिलत न पूरबवत जथा, छीर माँहि नवनीत॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | सठ सुधरैं सतसंग तें, गये बहुत बुध भाषि।
जैसे मलै प्रसंग तें, चंदन होहिं कुसाखि॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | प्रभु प्रेरक सब जगत को, नट नागर गोविंद।
ज्यों नट पट के गोट ह्वै, नटी नचावत वृंद॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | दारिद सुरतरु ताप ससि, हरै सुरसरी पाप।
साधु समागम तिहु हरे, पाप दीनता ताप॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | प्रभु पूरन मति शुद्ध बिनु, सब मैं ह्वै न प्रकास।
विमल बिना प्रतिबिंब को, जैसे होय न भास॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | सबै काम सुधरैं जबै, करैं कृपा श्रीराम।
जैसे कृषि किसान की, उपजावे घन स्याम॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | किए करम विपरीत तऊ, तऊ संत सोभंत।
नील कंठ भे खाय विष, शिव छवि लहत अनंत॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | परधीनता दुख महा, सुख जग मैं स्वाधीन।
सुखी रमत सुक बन विषे, कनक पींजरे दीन॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | सुपन रूप संसार है, मोह नींद के माहिं।
बोध रूप जागे बिना, ताके दुख नहहिं जाहिं॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | एकै सबही मैं बस्यो, वासुदेव करि वास।
ज्यों घट मठ भीतर बहिर, पूर्यो एक अकास॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | राजभ्रष्ट लखि भूप कों, त्यागि जाहिं सब दास।
ज्यों सर सूखो देखि कै, हँस न आवत पास॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | सन बंधन को संग है, जग मैं छनक विचारि।
मिलै कूप पर आनि ज्यों, घर-घर तें पनिहारि॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | साधु नहूँ को होय दुख, संग गहे अति खोट।
घटी पात्र जल को हरै, परै घड़ी पर चोट॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | बुध के मृदु उपदेश कों, खल त्यागें ततकाल।
तुरित बिनासै तोरि कपि, जथा सुमन की माल॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | गुन तें होत प्रधान जग, और ऊँच ते नाहिं।
हरि हित अति से मालती, तथा न सेमल जाहिं॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | सील सुमति सरधा बिना, बुध सँग सठ सुधरैं न।
होहिं न सुजन पिसाच गन, शिवहि सेइ दिन रैन॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | नहिं धन धन है बुध कहैं, विद्या वित्त अनूप।
चोरि सकै नहिं चोरऊ, छोरि सकै नहिं भूप॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | प्रियवादी प्रियलोक मैं, तैसे नहिं कटु बैन।
पिक प्रिय तथा उलूक सों, कोऊ प्रीति करै न॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | साधन बर है मुकुति को, जान कहै मुनि वाक।
जैसे पावक के बिना, सिद्ध होत नहिं पाक॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | करम करैं कोऊ अशुभ, लगै संग बसि काहु।
जथा चार संबन्ध ते, बंध होत है साहु॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | गुन प्रभुता पदवी, जहाँ तहाँ बनै सब कार।
मिलै न कछु फल आँक तें, बजे नाम मंदार॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | तासों नहिं कछु होत जो, बकैं वृथा बहु बार।
पूरन जल बरसे नहीं, ज्यों घन गरजनहार॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | जाको प्रभुता से बड़ो, नहिं वर कुल अवतार।
कुंभ कूप कों नहिं पियो, कुंभज सिंधु अपार॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | चतुरंगिनी समेटि दल, कायर नर भजि जात।
एक सूर सब सैन कों, रोकि लेत न डरात॥ |
दीनदयाल गिरि | 1802 -1858 | दोहा | null | इक बाहर इक भीतर, इक मृद दुहु दिसि पूर।
सोहत नर जग त्रिविधि ज्यों, बेर बदाम अँगूर॥ |
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