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Poet's Name stringclasses 61
values | Period stringclasses 40
values | Language stringclasses 3
values | Additional Info stringclasses 16
values | Poem Text stringlengths 66 168k ⌀ |
|---|---|---|---|---|
चंदबरदाई | 1168 -1192 | दोहा | null | सरस काव्य रचना रचौं, खलजन सुनिन हसंत।
जैसे सिंधुर देखि मग, स्वान सुभाव भुसंत॥ |
चंदबरदाई | 1168 -1192 | दोहा | null | तौ पुनि सुजन निमित्त गुन, रचिए तन मन फूल।
जूँ का भय जिय जानिकै, क्यों डारिए दुकूल॥ |
चतुर्भुजदास | 1518 -1585 | दोहा | null | सकल तू बल-छल छाँड़ि, मुग्ध सेवै मुरलीधर।
मिटहिं सहा भव-द्वंद फंद, कटि रटि राधावर॥ |
चतुर्भुजदास | 1518 -1585 | दोहा | null | वत्सलता अरु अभय सदा, आरत-अघ-सोखन।
दीनबंधु सुखसिंधु सकल, सुख दै दुख-मोचन॥ |
चतुर्भुजदास | 1518 -1585 | दोहा | null | अखिल लोक के जीव हैं, जु तिन को जीवन जल।
सकल सिद्धि अरु रिद्धि जानि, जीवन जु भक्ति-फल॥ |
चतुर्भुजदास | 1518 -1585 | दोहा | null | प्रगट वंदन रसना जु प्रगट, अरु प्रगट नाम रढ़ि।
जीभ निसेनी मुक्ति तिहि बल, आरोहि मृढ़ चढ़ि॥ |
चतुर्भुजदास | 1518 -1585 | दोहा | null | और धर्म अरु कर्म करत, भव-भटक न मिटिहै।
जुगम-महाशृंखला जु, हरि-भजनन कटिहै॥ |
चतुर्भुजदास | 1518 -1585 | दोहा | null | ‘चत्रभुज' मुरलीधर-कृपा परै पार, हरि-भजन-बल।
छीपा, चमार, ताँती, तुरक, जगमगात जाने सकल॥ |
चतुर्भुजदास | 1518 -1585 | दोहा | null | ऊँच नीच पद चहत ताहि, कामिक कर्म करिहै।
कबहुँ होइ सुरराज कबहुँ, तिर्यक-तनु धरिहै॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | परज्या कौ रक्षा करै सोई स्वामि अनूप।
तर सब कौं छहियाँ करै, सहै आप सिर धूप॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | सदा झूठहीं बोलिहैं, तिहि आदर घटि जाइ।
कबहू बोलै साँचु वहु, तऊ न को पतियाइ॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | तीन भाँति के द्रुजन हैं पंडित कहत बिचित्र।
अप बैरी, बैरी सजन, पुनि द्रुजनन कौ नित्र॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | जो कुछ जैहै हाथ तें, काहू न ताकौ सोग।
रोग अंग कौ बहुत हैं, चिंता चित कौ रोग॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | न्याव न कोऊ पाइहै, परै लालची काम।
सोई साचे होत है, जाकी गँठिया दाम॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | ताकौं ढील न कीजिए ह्वै जु धरम को काजु।
को जानैं कल ह्वै कहा करिबो सो करि आजु॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | जानि लेहू कवि जान कहि, सो राजत संपूर।
जामै ह्वै ये तीन गुन न्याई दाता सूर॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | ऐसो रूष लगाइये, जो ह्वै है फलवान।
ब्रिच्छ कटीलौ पालिये, यामै कौन सयान॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | परजा जानहु मूल तुम्ह, राजा ब्रिच्छ बिचार।
अपनी जरहिं उषारिहै, परजा षोवनहार॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | दुष दीने हूँ देत सुष उत्तम पुरुष सुजानि।
कंचन जेतौ ताइये, तेतौ बारह बानि॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | उतम पुरुषन की सभा, रहिये निसदिन चाहि।
मूढ़ नरन संग जो रहै, घटि जैहैं बुधि ताहि॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | ठौर ठौर मनरथ फिरत, कोऊ छूट्यो नाहिं।
मानस की कहिए कहा, पसु पंछिन हू माहिं॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | आदुर दये कुजात कूँ, नाहिन होत सुजात।
धोये गोरो ह्वै नहिं हबसी कारो गात॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | जो न समावै जगत मैं, ऐसा रूप अपार।
सो मन माहिं समाइहै, तकहु प्रेमु अधिकार॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | मूरिख सिष मानत नहीं, सकु ज्यों पढ़त न काग।
बहरै आगै बाँसुरी बाजै लषै न राग॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | रिसु कै बस ना हूजिए, कीजै बात बिचार।
पुनि पछिताये ह्वै कहा, जो ह्वै जाइ बिगार॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | पाँच बात ये जगत मैं, निबहत नाहिं निदान।
लच्छी, सुष, दुष, रूप, छबि, तरुनाई कहि जान॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | दुष दै को न रुसाइये, कहत जान सुन मित्त।
ये ते फूटे ना जुरैं, सीसा मुकता चित्त॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | घटै बढ़ै निकसै छपै, ससि कपटी की पीत।
सदा रहै सम भाइ ही, साधु सूर की रीत॥ |
जान कवि | 1614 -1664 | दोहा | null | हँसि हँसि परिहै आपुही, बिनु हाँसी की ठौर।
ताते रोवन है भलौ कहत गुनी सिरिमौर॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | गज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराज।
चंद लखत बिकसत कमल, कह जमाल किहि काज॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला ऐसी प्रीत कर, ज्यूँ बालक की माय।
मन लै राखै पालणौ, तन पाणी कूँ जाय॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी मच्छ कराय।
टुक एक जल थी बीछड़े, तड़फ-तड़फ मर जाय॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला लट्टू काठ का, रंग दिया करतार।
डोरी बाँधी प्रेम की, घूम रह्या संसार॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | स्याम पूतरी, सेत हर, अरुण ब्रह्म चख लाल।
तीनों देवन बस करे, क्यौं मन रहै जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | नैणाँ का लडुवा करूँ, कुच का करूँ अनार।
सीस नाय आगे धरूँ, लेवो चतर जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | सज्जन हित कंचन-कलश, तोरि निहारिय हाल।
दुर्जन हित कुमार-घट, बिनसिन जुरै जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | पूरी माँगति प्रेम सो, तजी कचौरी प्रीत।
बराबरी के नेह में, कह जमाल का रीत॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | बाल पनैं धोले भये, तरुन पनैं भये लाल।
बिरध पनैं काले भये, कारन कवन जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | स्याम पूतरी, सेत हर, अरुण ब्रह्म चख लाल।
तीनों देवन बस करे, क्यों मन रहै जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | सज्जन एहा चाहिये, जेहा तरवर ताल।
फल भच्छत पानी पियत, नाहि न करत जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला एक परब्ब छवि, चंद मधे विविचंद।
ता मध्ये होय नीकसे, केहर चढ़े गयंद॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी हिंदू जोय।
पूत पराये कारणे, जल बल कोयला होय॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | प्रीतम नहिं कछु लखि सक्यो, आलि कही तिय कान।
नथ उतारि धरि नाक तं, कह जमाल का जान॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | या तन की भट्टी करूँ, मन कूँ करूँ कलाल।
नैणाँ का प्याला करूँ, भर-भर पियो जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी निस अर चंद।
चंदे बिन निस सांवली, निस बिन चंदो मंद॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | प्रीत ज कीजै देह धर, उत्तम कुल सूँ लाल।
चकमक जुग जल में रहै, अगन न तजै जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | सकल क्षत्रपति बस किये, अपणे ही बल बाल।
सबल कुँ अबला कहै, मूरख लोग जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | राधे की बेसर बिचै, बनी अमोलक बाल।
नंदकुमार निरखत रहैं, आठों पहर जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | नयन रँगीले कुच कठिन, मधुर बयण पिक लाल।
कामण चली गयंद गति, सब बिधि वणी, जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | तरवर पत्त निपत्त भयो, फिर पतयो ततकाल।
जोबन पत्त निपत्त भयो, फिर पतयौ न जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | हरै पीर तापैं हरी बिरद् कहावत लाल।
मो तन में वेदन भरी, सो नहिं हरी जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला जोबन फूल है, फूलत ही कुमलाय।
जाण बटाऊ पंथसरि, वैसे ही उठ जाय॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | नैन मिलैं तैं मन मिलैं, होई साट दर हाल।
इह तौ सौदा सहज का, जोर न चलत जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | या तन की सारैं करूँ, प्रीत जु पासे लाल।
सतगुरु दाँव बताइया, चौपर रमे जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | हरै पीर तापैं हरी, बिरद कहावत लाल।
मो तन में वेदन भरी, सो नहिं हरी जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला जा सूँ प्रीत कर, प्रीत सहित रह पास।
ना वह मिलै न बीछड़ै, ना तो होय निरास॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | अगर चँदण की सिर घड़ी, बिच बींटली गुलाल।
एक ज दरसण हम कियो, तीरथ जात जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | या तन की भट्टी करूँ, मन कूँ करूँ कलाल।
नैणाँ का प्याला करूँ, भर भर पियो जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | सागर तट गागर भरति, नागरि नजरि छिपाय।
रहि-रहि रुख मुख लखति क्यों, कह जमाल समुझाय॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | सज्जन हित कंचन-कलश, तोरि निहारिय हाल।
दुर्जन हित कुमार-घट, बिनसिन जुरै जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | पूनम चाँद कसूँभ रँग, नदी तीर द्रम डाल।
रेत, भींत,भुस लिपणो, ऐ थिर नहीं जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | पूरी माँगति प्रेम सो, तजी कचौरी प्रीत।
बराबरी के नेह में, कह जमाल का रीत॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | मिलै प्रीत न होत है, सब काहू कैं लाल।
बिना मिले मन में हरष, साँची प्रीत जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जग सागर है अति गहर, लहरि विषैं अति लाल।
चढ़ि जिहाज अति नाम की, उतरें पार जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | नयन रँगीले कुच कठिन, मधुर बयण पिक लाल।
कामण चली गयंद गति, सब बिधि बणी जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | जमला करै त क्या डरैं, कर-कर क्या पछताय।
रोपै पेड़ बबूल का, आम कहाँ तें खाय॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | अबसि चैन-चित रैण-दिन, भजहीं खगाधिपध्याय।
सीता-पति-पद-पद्म-चह, कह जमाल गुण गाय॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | सब घट माँही राम है, ज्यौं गिरिसुत में लाल।
ज्ञान गुरु चकमक बिना, प्रकट न होत जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | रे हितियारे अधरमी, तू न आवत लाल।
जोबन अजुंरी नीर सम, छिन घट जात जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | चंपा हनुमत रूप अलि, ला अक्षर लिखि बाम।
प्रेमी प्रति पतिया दियो, कह जमाल किहि काम॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | शुतर गिरयो भहराय के, जब भा पहुँच्यो काल।
अल्प मृत्यु कूँ देखि के, जोगी भयो जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | करि सिंगार पिय पै चली, हाथ कुसुम की माल।
हरी छोड़ हर पै गई, कारन कौन जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | पहिरैं भूषन होत है, सब के तन छबि लाल।
तुव तन कंचन तै सरस, जोति न होत जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | स्रवन छाँड़ि, अधरन लगे, ये अलकन के बाल।
काम डसनि नागनि जहीं, निकसे नाहिं जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | कहँ बोई जाँमी कहाँ, कहँ फैली तिहिं बेल।
कहँ लागी फूलन फलन, कह जमाल का खेल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | प्रीतम नहिं कछु लखि सक्यो, आलि कही तिय कान।
नथ उतारि धरि नाक तँ, कह जमाल का जान॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | कर कंपत लेखनि डुलत, रोम रोम दुख लाल।
प्रीतम कूँ पतिया लिखुं, लिखी न जात जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | कर कंपत लेखनि डुलत, रोम-रोम दुःख लाल।
प्रीतम कूँ पतिया लिखुँ, लिखी न जात जमाल॥ |
जमाल | 1545 -1605 | दोहा | null | मन उमगे हसती भयो, चिके पाट असराल।
सकंल तोड़ै सार का, मुझ बस नहीं जमाल॥ |
जसुराम | null | दोहा | null | राजनीति सबही पढ़े, सब ते राखे स्नेह।
जा के किमत नहिं जसू, लगे कुलच्छन एह॥ |
जसुराम | null | दोहा | null | रैयत सब राज़ी रहै, मेटन राउत मान।
आमद घटै न राय की, ऐसे करै प्रधान॥ |
जसुराम | null | दोहा | null | चोरी चुगली पर तिया, कोऊ काम कुकाम।
एती बात न जानिये, सोऊ रैयत नाम॥ |
जसुराम | null | दोहा | null | जो दीजै परधान पद, तो कीजे इतवार।
जो इतवार न होय जसु, तो परधान निवार॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | कुंभ उच्च कुच सिव बने, मुक्तमाल सिर गंग।
नखछत ससि सोहै खरो, भस्म खौरि भरि अंग॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | मुग्धा तन त्रिबली बनी, रोमावलि के संग।
डोरी गहि बैरी मनौ, अब ही चढ़यो अनंग॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | मुक्तमाल हिय स्याम कैं, देखी भावत नेन।
छबि ऐसी लागत मनौ, कालिंदी में फेन॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | पिक कुहुकै चातक रटै, प्रगटै दामिनि जोत।
पिय बिन यह कारी घटा, प्यारी कैसे होत॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | सुधा भरयो ससि सब कहैं, नई रीति यह आहि।
चंद लगै जु चकोर ह्वै, बिस मारत क्यों ताहि॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | जल सूकै पुहमी जरै, निसि यामें कृस होत।
ग्रीषम कूँ ढूँढत फिरै, घन लै बिजुरी जोत॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | पुहमि बियोगिनि मेह की, धौरी पीरी जोत।
जरि-जरि कारी पीय बिन, मिलैं हरीरी होत॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | रबि दरसै पंकज खुलै, उड़ै भौंर इकबार।
हिय तें मनौ बियोग के, निकसैं बुझे अँगार॥ |
जसवंत सिंह | 1629 -1678 | दोहा | null | आसव की यह रीति है, पीयत देत छकाइ।
यह अचिरज तियरूपमद, सुध आए चढ़ि जाइ॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | ‘तुलसी’ काया खेत है, मनसा भयौ किसान।
पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस।
बरषत वारिद-बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | ‘तुलसी’ सब छल छाँड़िकै, कीजै राम-सनेह।
अंतर पति सों है कहा, जिन देखी सब देह॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार।
राग न रोष न दोष दुख, दास भए भव पार॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | तुलसी जौं पै राम सों, नाहिन सहज सनेह।
मूंड़ मुड़ायो बादिहीं, भाँड़ भयो तजि गेह॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | दंपति रस रसना दसन, परिजन बदन सुगेह।
तुलसी हर हित बरन सिसु, संपति सहज सनेह॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | ‘तुलसी’ साथी विपति के, विद्या, विनय, विवेक।
साहस, सुकृत, सुसत्य-व्रत, राम-भरोसो एक॥ |
तुलसीदास | 1511 -1623 | दोहा | null | लोग मगन सब जोग हीं, जोग जायँ बिनु छेम।
त्यों तुलसी के भावगत, राम प्रेम बिनु नेम॥ |
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